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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
साध्वाचारा शुचिर्दक्षा कुटुम्वस्य हितैषिणी |  १४   क
भर्तुश्चापि हितं यत्तत्सततं सानुवर्तते ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति