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अनुशासन पर्व
अध्याय ६८
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युधिष्ठिर उवाच
देय़ाः किंलक्षणा गावः काश्चापि परिवर्जय़ेत् |  १३   क
कीदृशाय़ प्रदातव्या न देय़ाः कीदृशाय़ च ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति