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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६८
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वैशम्पाय़न उवाच
उत्तिष्ठ पश्य वदनं लोकनाथस्य धीमतः |  १३   क
पुण्डरीकपलाशाक्षं पुरेव चपलेक्षणम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति