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सभा पर्व
अध्याय ६८
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वैशम्पाय़न उवाच
तद्वै श्रुत्वा भीमसेनोऽत्यमर्षी; निर्भर्त्स्योच्चैस्तं निगृह्यैव रोषात् |  १५   क
उवाचेदं सहसैवोपगम्य; सिंहो यथा हैमवतः शृगालम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति