सभा पर्व  अध्याय ६८

भीमसेन उवाच

यथा तुदसि मर्माणि वाक्षरैरिह नो भृशम् |  १७   क
तथा स्मारय़िता तेऽहं कृन्तन्मर्माणि संय़ुगे ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति