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द्रोण पर्व
अध्याय ११५
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धृतराष्ट्र उवाच
धनञ्जय़स्तु सङ्क्रुद्धः प्रविष्टो मामकं वलम् |  २   क
रक्षितं द्रोणकर्णाभ्यामप्रवेश्यं सुरैरपि ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति