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वन पर्व
अध्याय ६८
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वृहदश्व उवाच
यथा चाहं समानीता सुदेवेनाशु वान्धवान् |  १६   क
तेनैव मङ्गलेनाशु सुदेवो यातु माचिरम् |  १६   ख
समानेतुं नलं मातरय़ोध्यां नगरीमितः ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति