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वन पर्व
अध्याय ६८
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वृहदश्व उवाच
विश्रान्तं च ततः पश्चात्पर्णादं द्विजसत्तमम् |  १७   क
अर्चय़ामास वैदर्भी धनेनातीव भामिनी ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति