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वन पर्व
अध्याय ६८
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वृहदश्व उवाच
यदि सम्भावनीय़ं ते गच्छ शीघ्रमरिन्दम |  २३   क
सूर्योदय़े द्वितीय़ं सा भर्तारं वरय़िष्यति |  २३   ख
न हि स ज्ञाय़ते वीरो नलो जीवन्मृतोऽपि वा ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति