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वन पर्व
अध्याय ६८
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वृहदश्व उवाच
श्रावितश्च मय़ा वाक्यं त्वदीय़ं स महाजने |  ३   क
ऋतुपर्णो महाभागो यथोक्तं वरवर्णिनि ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति