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शान्ति पर्व
अध्याय २०२
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युधिष्ठिर उवाच
तिर्यग्योनिगतं रूपं कथं धारितवान्हरिः |  ३   क
केन कार्यविसर्गेण तन्मे व्रूहि पितामह ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति