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आदि पर्व
अध्याय १००
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य कृष्णस्य कपिला जटा दीप्ते च लोचने |  ५   क
वभ्रूणि चैव श्मश्रूणि दृष्ट्वा देवी न्यमीलय़त् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति