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शान्ति पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
कथय़ेद्देवलोकं यो देवराजसमीपतः |  ५   क
धर्मकामार्थशास्त्राणां सोऽर्थान्व्रूय़ात्तवाग्रतः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति