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द्रोण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
क्षते क्षारं स हि ददौ पाण्डवस्य महात्मनः |  १४   क
पार्थोऽपि भृशसंविद्धो ध्वजय़ष्टिं समाश्रितः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति