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द्रोण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
कृष्णश्च भृशसन्तप्तो दृष्ट्वा पार्थं विचेतसम् |  १६   क
आश्वासय़त्सुहृद्याभिर्वाग्भिस्तत्र धनञ्जय़म् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति