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द्रोण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तौ रथिनां श्रेष्ठौ लव्धलक्षौ धनञ्जय़म् |  १७   क
वासुदेवं च वार्ष्णेय़ं शरवर्षैः समन्ततः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति