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द्रोण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
वाहवो विशिखैश्छिन्नाः शिरांस्युन्मथितानि च |  ३५   क
च्यवमानान्यदृश्यन्त द्रुमेभ्य इव पक्षिणः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति