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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
देवास्तस्य वचः श्रुत्वा गत्वा दक्षमथाव्रुवन् |  ६३   क
प्रसीद भगवन्सोमे शापश्चैष निवर्त्यताम् ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति