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द्रोण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
ते निवृत्य पुनः पार्थं सर्वतः पर्यवारय़न् |  ४   क
रणे सपत्नान्निघ्नन्तं जिगीषन्तन्परान्युधि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति