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द्रोण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
शरैश्च शतशो विद्धास्ते सङ्घाः सङ्घचारिणः |  ४५   क
प्राद्रवन्त रणे भीता गिरिगह्वरवासिनः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति