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द्रोण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
गजाश्वसादिम्लेच्छानां पतितानां शतैः शरैः |  ४६   क
वडाः कङ्का वृका भूमावपिवन्रुधिरं मुदा ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति