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सभा पर्व
अध्याय ७०
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वैशम्पाय़न उवाच
धन्यां चातीन्द्रिय़ज्ञानामिमां प्राप्तां परां गतिम् |  १९   क
मन्येऽद्य माद्रीं धर्मज्ञां कल्याणीं सर्वथैव हि ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति