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द्रोण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
रथानीकावगाढश्च वारणाश्वशतैर्वृतः |  ६६   क
सोऽदृश्यत तदा पार्थो घनैः सूर्य इवावृतः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति