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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
शल्यस्तु कर्णार्जुनय़ोर्विमर्दे; वलानि दृष्ट्वा मृदितानि वाणैः |  १   क
दुर्योधनं यान्तमवेक्षमाणो; सन्दर्शय़द्भारत युद्धभूमिम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति