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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
भोजानीकं समासाद्य हार्दिक्येनाभिरक्षितम् |  २०   क
प्रमथ्य वहुधा राजन्भीमसेनः समभ्ययात् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति