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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
महीधराभैः पतितैर्महागजैः; सकृत्प्रविद्धैः शरविद्धमर्मभिः |  १५   क
तैर्विह्वलद्भिश्च गतासुभिश्च; प्रध्वस्तय़न्त्राय़ुधवर्मय़ोधैः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति