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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
वज्रापविद्धैरिव चाचलेन्द्रै; र्विभिन्नपाषाणमृगद्रुमौषधैः |  १६   क
प्रविद्धघण्टाङ्कुशतोमरध्वजैः; सहेममालै रुधिरौघसम्प्लुतैः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति