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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
हतैर्मनुष्याश्वगजैश्च सङ्ख्ये; शरावभिन्नैश्च रथैर्वभूव |  २२   क
धनञ्जय़स्याधिरथेश्च मार्गे; गजैरगम्या वसुधातिदुर्गा ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति