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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
विमुक्तय़न्त्रैर्निहतैरय़स्मय़ै; र्हतानुषङ्गैर्विनिषङ्गवन्धुरैः |  २४   क
प्रभग्ननीडैर्मणिहेममण्डितैः; स्तृता मही द्यौरिव शारदैर्घनैः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति