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वन पर्व
अध्याय २८०
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततस्तु श्वश्रूश्वशुरावूचतुस्तां नृपात्मजाम् |  १५   क
एकान्तस्थमिदं वाक्यं प्रीत्या भरतसत्तम ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति