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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
देहांश्च भोगांश्च परिच्छदांश्च; त्यक्त्वा मनोज्ञानि सुखानि चापि |  ३१   क
स्वधर्मनिष्ठां महतीमवाप्य; व्याप्तांश्च लोकान्यशसा समीय़ुः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति