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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
इत्येवमुक्त्वा विरराम शल्यो; दुर्योधनः शोकपरीतचेताः |  ३२   क
हा कर्ण हा कर्ण इति व्रुवाण; आर्तो विसञ्ज्ञो भृशमश्रुनेत्रः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति