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वन पर्व
अध्याय १४५
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वैशम्पाय़न उवाच
दिव्यज्ञानोपपन्नास्ते दृष्ट्वा प्राप्तं युधिष्ठिरम् |  ३२   क
अभ्यगच्छन्त सुप्रीताः सर्व एव महर्षय़ः |  ३२   ख
आशीर्वादान्प्रय़ुञ्जानाः स्वाध्याय़निरता भृशम् ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति