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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
वधेन कर्णस्य सुदुःखितास्ते; हा कर्ण हा कर्ण इति व्रुवाणाः |  ३६   क
द्रुतं प्रय़ाताः शिविराणि राज; न्दिवाकरं रक्तमवेक्षमाणाः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति