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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
कर्णस्य देहं रुधिरावसिक्तं; भक्तानुकम्पी भगवान्विवस्वान् |  ३८   क
स्पृष्ट्वा करैर्लोहितरक्तरूपः; सिष्णासुरभ्येति परं समुद्रम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति