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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
ददानीत्येव योऽवोचन्न नास्तीत्यर्थितोऽर्थिभिः |  ४४   क
सद्भिः सदा सत्पुरुषः स हतो द्वैरथे वृषः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति