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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
यस्य व्राह्मणसात्सर्वमात्मार्थं न महात्मनः |  ४५   क
नादेय़ं व्राह्मणेष्वासीद्यस्य स्वमपि जीवितम् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति