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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
सदा नॄणां प्रिय़ो दाता प्रिय़दानो दिवं गतः |  ४६   क
आदाय़ तव पुत्राणां जय़ाशां शर्म वर्म च ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति