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शान्ति पर्व
अध्याय २३
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वैशम्पाय़न उवाच
स्वधर्मं चर धर्मज्ञ यथाशास्त्रं यथाविधि |  ३   क
न हि गार्हस्थ्यमुत्सृज्य तवारण्यं विधीय़ते ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति