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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
शशिप्रकाशाननमर्जुनो यदा; क्षुरेण कर्णस्य शिरो न्यपातय़त् |  ५१   क
अथान्तरिक्षे दिवि चेह चासकृ; द्वभूव हाहेति जनस्य निस्वनः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति