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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
स देवगन्धर्वमनुष्यपूजितं; निहत्य कर्णं रिपुमाहवेऽर्जुनः |  ५२   क
रराज पार्थः परमेण तेजसा; वृत्रं निहत्येव सहस्रलोचनः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति