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कर्ण पर्व
अध्याय ६८
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सञ्जय़ उवाच
सदेवगन्धर्वमनुष्यचारणै; र्महर्षिभिर्यक्षमहोरगैरपि |  ६३   क
जय़ाभिवृद्ध्या परय़ाभिपूजितौ; निहत्य कर्णं परमाहवे तदा ||  ६३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति