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कर्ण पर्व
अध्याय ६
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सञ्जय़ उवाच
अवस्थितं रणे ज्ञात्वा पाण्डवास्त्वां महारथम् |  ३०   क
द्रविष्यन्ति सपाञ्चाला विष्णुं दृष्ट्वेव दानवाः |  ३०   ख
तस्मात्त्वं पुरुषव्याघ्र प्रकर्षेथा महाचमूम् ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति