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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
अथ जीवति ते भर्ता प्रोषितोऽप्यथ वा क्वचित् |  ६२   क
अगम्या परभार्येति चतुर्थो धर्मसङ्करः ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति