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अनुशासन पर्व
अध्याय १३५
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भीष्म उवाच
ससुरासुरगन्धर्वं सय़क्षोरगराक्षसम् |  १३५   क
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ||  १३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति