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अनुशासन पर्व
अध्याय १४४
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वासुदेव उवाच
अन्यानपि सृजेय़ुश्च लोकाँल्लोकेश्वरांस्तथा |  ११   क
कथं तेषु न वर्तेय़ सम्यग्ज्ञानात्सुतेजसः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति