वन पर्व  अध्याय ६९

ऋतुपर्ण उवाच

त्वमेव हय़तत्त्वज्ञः कुशलश्चासि वाहुक |  १६   क
यान्मन्यसे समर्थांस्त्वं क्षिप्रं तानेव योजय़ ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति