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द्रोण पर्व
अध्याय १४४
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सञ्जय़ उवाच
सङ्क्रुद्धः शकुनिं षष्ट्या विव्याध भरतर्षभ |  १०   क
पुनश्चैव शतेनैव नाराचानां स्तनान्तरे ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति