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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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धृतराष्ट्र उवाच
शतवर्षजीवी यश्च शूरो मनुष्यो; वेदाध्याय़ी यश्च यज्वाप्रमत्तः |  ३९   क
एते सर्वे शक्रलोकं व्रजन्ति; परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति