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द्रोण पर्व
अध्याय ६९
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द्रोण उवाच
ततो जघान समरे वृत्रं देवपतिः स्वय़म् |  ६५   क
तं च मत्रमय़ं वन्धं वर्म चाङ्गिरसे ददौ ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति