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द्रोण पर्व
अध्याय ६९
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सञ्जय़ उवाच
यथा च व्रह्मणा वद्धं सङ्ग्रामे तारकामय़े |  ७०   क
शक्रस्य कवचं दिव्यं तथा वध्नाम्यहं तव ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति